सोनभद्र, मेरे गांव का नद

  • सफेद चाक हूं मैं

    समय की
    अंधेरी
    उदास सड़कों पर
    जीवन की
    उष्ण , गर्म हथेली से
    घिसा जाता
    सफेद चाक हूं मैं

    कि
    क्या
    कभी मिटूंगा मैं

    बस
    अपना
    नहीं रह जाउंगा

    और तब

    मैं नहीं

    जीवन बजेगा
    कुछ देर

    खाली हथेली सा
    डग - डग - डग ...
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    कुमार मुकुल का धर्मेन्‍द्र सुशांत द्वारा बनाया गया स्‍केच

  • इच्छाओं की उम्र नहीं होती

    इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती
    ये इच्छाएँ थीं
    कि एक बूढ़ा
    पूरी की पूरी जवान सदी के विरुद्ध
    अपनी हज़ार बाहों के साथ
    उठ खड़ा होता है
    और उसकी चूलें हिला डालता है
    ये भी इच्छाएँ थीं
    कि तीन व्यक्ति तिरंगे-सा लहराने लगते हैं
    करोड़ों हाथ थाम लेते हैं उन्हें
    और मिलकर उखाड़ फेंकते हैं
    हिलती हुई सदी को सात समंदर पार
    ये इच्छाएँ ही थीं
    कि एक आदमी अपनी सूखी हडि्डयों को
    लहू में डूबोकर लिखता है
    श्रम-द्वंद्व-भौतिकता
    और विचारों की आधी दुनिया
    लाल हो जाती है
    इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती
    अगर विवेक की डांडी टूटी न हो
    बाँहों की मछलियाँ गतिमान हों
    तो खेई जा सकती है कभी-भी
    इच्छाओं की नौका
    अंधेरे की लहरों के पार ।
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    1989में लिखी इस कविता को जनशक्ति में डॉ.खगेन्द्र ठाकुर ने छापा था। 2006 में यह कादंबिनी में छपी। 2009 में नवभारत के नामवर सिंह के संपादन में निकले विशेषांक में छपी। फिर यह जन संस्‍कृति मंच की स्‍मारिका में छपी। पहली बार इस कविता का पारिश्रमिक कुछ नहीं था,कादंबिनी से 500 रूपये मिले थे और नवभारत से 2000 मिले।

  • श्री विजय कुमार का पत्र

    प्रिय कुमार मुकुल जी,
    आपकी आलोचना पुस्तक की पांडुलिपि लौटा रहा हूं। आपने इसे पढने का अवसर मुझे दिया यह मेरी खुशकिस्मती है। मुझे लगता है कि जब यह पुस्तक रूप में आयेगी तो हिंदी संसार में व्यापक स्तर पर इसका स्वागत होगा। दलबद्धता या शिविरबद्धता से दूर, मुक्त हृदय और पैनी दृष्टि से कवि के संसार में उतरने का यह सामर्थ्य किसी को भी प्रभावित करेगा। एक गहरी अन्तदृष्टि की बिना पर आप बिना लाग-लपेट बडी तीक्ष्णता और स्पष्टता के साथ अपनी बात कहते हैं और यह आलोचना का साहस है। इस साहस में एक गहरी सहृदयता भी मुझे दिखाई दे रही है। हमलोग एक ऐसे दौर में हैं जब वरिष्ठों के भी कथन की विश्वसनीयता आज संदिग्ध हुई है लेकिन इस बुरे समय में अच्छी आलोचना के गुण ही हमारे सारे लिखने-पढने के कार्य को एक सार्थकता दे सकते हैं। मुझे आपकी इस आलोचना पुस्तक को पढते हुए सचमुच आनंद आया है। आप मित्र हैं इसलिए यह नहीं कह रहा हूं। ( साहित्य में यूं भी मित्रताओं का यह बहुत विश्वसनीय समय नहीं रह गया है। गणित ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये हैं।) आपको पुनः एक बार बधाई। इसे जल्दी से जल्दी किसी अच्छे प्रकाशक से छपवा लें ताकि यह आम पाठकों तक भी सही तरीके से पहुंच जाये। आशा है आप सानंद होंगे।
    आपका
    विजय कुमार

Kumar Mukul

कुमार मुकुल

कवि, पत्रकार, होमियोपैथ, समीक्षक 

एम ए ( राजनीति विज्ञान ) ।1989 में अमान वीमेंस कालेजफुलवारी शरीफ] पटना में अध्यापन।1994 से 2005 के बीच हिन्दी की आधा दर्जन पत्र-पत्रिकाओं अमर उजाला, पाटलिपुत्र टाइम्स,प्रभात खबर आदि में संवाददाता, उपसंपादक, संपादकीय प्रभारी और फीचर संपादक के रूप में कार्य। 1998-2000 दैनिक 'अमर उजाला' के लिए पटना से संवाददाता के तौर पर कार्य। इस दौरान अखबार में एक साप्‍ताहिक कॉलम 'बिहार : तंत्र जारी है' का लगातार लेखन। 2003 हैदराबाद 'स्‍टार फीचर्स' में संपादक के रूप में काम।2003 में बेटे की कैंसर की बीमारी के चलते नियमित कार्य में बाधाएं। इस बीच दिल्‍ली में साहित्यिक पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' में संपादकीय सहयोगी के रूप में काम। 2005 से 2007 के बीच द्वैमासिक साहित्यिक लघु पत्रिका 'सम्प्रति पथ' का दो वर्षों तक संपादन। 2007 से 2011 त्रैमासिक 'मनोवेद' में कार्यकारी संपादक के रूप में कार्य। 2013 से 2014 कल्पतरु एक्सप्रेस, दैनिक, आगरा में स्थानीय संपादक। अप्रैल 2015 से अगस्‍त 2015 तक दिल्‍ली के दैनिक देशबन्‍धु में स्‍थानीय संपादक के रूप में कार्य। नवंबर 2015 से राजस्‍थान पत्रिका डिजिटल के संपादकीय विभाग जयपुर में कार्य।

कृतियां: 2000 में रश्मिप्रिया प्रकाशन से ‘परिदृश्‍य के भीतर’ और 2006 में  मेधा बुक्‍स से ‘ग्‍यारह सितंबर और अन्‍य कविताएं’शीर्षक दो कविता संग्रह प्रकाशित। 2000 में ‘परिदृश्‍य के भीतर’ के लिए पटना पुस्‍तक मेले का ‘विद्यापति सम्‍मान। 2012 में प्रभात प्रकाशन से 'डा लोहिया और उनका जीवन-दर्शन' नामक किताब प्रकाशित। 2013 में नई किताब प्रकाशन से 'अंधेरे में कविता के रंग' नामक काव्यालोचना की पुस्तक‍ प्रकाशि‍त। 2014 'आज की कविता-प्रतिनिधि‍ स्वर' नामक पांच कवियों के संकलन मेे संकलित। कैसर पर किता‍ब सोनूबीती 2014 में प्रकाशित।

अन्य: वसुधा, हंस, इंडिया टुडे, सहारा समय, समकालीन तीसरी दुनिया, जनपथ, जनमत, समकालीन सृजन, देशज समकालीन,शुक्रवार, आउटलुक, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, जनसत्ता,दैनिक जागरण,राजस्‍थान पत्रिका कादम्बिनी, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, प्रथम प्रवक्ता आदि पत्र-पत्रिकाओं में राजनीतिक - सामाजिक विषयों पर नियमित लेखन।http://hindiacom.blogspot.com/  [ कारवॉं KARVAAN ]

मेल - kumarmukul07@gmail.com

Sketch-Kumar Mukul - 2007